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पवित्रता का नया मीटर – जेब में रखो नोट

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“पवित्रता का नया मीटर—जेब में रखो नोट!” 🚩💸

आज तथाकथित मंदिर गया तो उसने सोचा था कि महादेव और पवनपुत्र के दर्शन से मन शांत होगा, पर वहां तो पण्डित जी ने ‘पवित्रता’ का एक नया ही विज्ञान समझा दिया।

​पण्डित जी ने तथाकथित को हनुमान जी को स्पर्श करने से बड़े प्रेम से (या कहें कि बड़े ‘ज्ञान’ से) रोक दिया। तर्क यह था कि— “पता नहीं आप कहां से आए हो, स्वच्छ हो या नहीं।” अब पण्डित जी को कौन समझाए कि तथाकथित तो रोज स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र पहनकर प्रभु के चरणों में शीश नवाने वाले साधारण भक्त हैं। पर शायद पण्डित जी की आँखों पर ‘दिव्य चश्मा’ चढ़ा है, जो केवल उन भक्तों की ‘स्वच्छता’ देख पाता है जिनके हाथों में भारी चढ़ावा होता है।

वाह रे व्यवस्था! कल तक सुना था कि मन चंगा तो कठौती में गंगा, पर आज पता चला कि “जेब में नोट भारी, तो अशुद्ध भक्त भी ब्रह्मचारी!” जो लोग मोटा चढ़ावा चढ़ा रहे हैं, पण्डित जी के लिए वे ‘गंगाजल’ से धुले हुए हो जाते हैं। उन्हें न स्पर्श से रोका जाता है, न उनकी स्वच्छता पर संदेह होता है। शायद पण्डित जी का ‘पवित्रता मीटर’ नोटों की गड़गड़ाहट से ही चार्ज होता है।

पण्डित जी को तथाकथित का सादर सुझाव:

महाराज, हनुमान जी ‘दीनबंधु’ हैं, ‘धनबंधु’ नहीं। उनकी भक्ति का अधिकार सबके लिए समान है। अगर मर्यादा का नियम है, तो उसे अपनी दक्षिणा की थाली देखकर मत बदलिए। ईश्वर के घर में ‘वीआईपी’ बनकर जाना भक्ति नहीं, अहंकार है। और इस अहंकार को बढ़ावा देना अधर्म है।

​अगली बार जाऊंगा तो शायद पण्डित जी को गंगाजल के बजाय ‘गाँधी जी’ दिखाने पड़ेंगे, क्योंकि वहां स्पर्श की अनुमति मन की शुद्धि से नहीं, जेब की गर्मी से मिलती है!

पवनपुत्र सबको सद्बुद्धि दें, विशेषकर उन ठेकेदारों को जो भगवान के दरबार में भी भेदभाव की दुकान चला रहे हैं। 🚩

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